‘अखिल भारतीय मुस्लिम‑संस्कृत संरक्षण एवं प्राच्य शोध संस्थान’

अज्ञात एवं दुर्लभ कृति-प्रकाशन माला, संख्या-1


  • नवाबखानखानाचरितम्
  • रचयिता : श्री रुद्रकवि (17 वीं सदी)
  • सम्पादन एवं हिन्दी अनुवाद : प्रताप कुमार मिश्र
  • प्रथम संस्करण : 2007 ई.
  • भूमिका-97,+ 48 पृष्ठ, H.B.
  • सूची, अनुक्रमणिका आदि
  • ISBN: 978-81-906145-1-1
मूल्य: 120/-

17 वीं शती में प्रणीत यह विशुद्ध ऐतिहासिक चम्पूकाव्य; सुदूर दक्षिण निवासी श्रीरुद्रकवि के द्वारा अपने आश्रय-दाता बागुलान-नरेश महाराज प्रतापशाह के आदेश पर बनाया गया था। मध्यकालीन भारत की महान् विभूति खानखाना अब्दुर्रहीम खां ‘रहीम’ के जीवन पर प्रणीत इस चम्पूकाव्य की सबसे बड़ी विशेषता है इसका रचना-प्रयोजन। अकबर के राजत्व तक मुगल-साम्राज्य एवं बागुलान के मध्य सुमधुर सम्बन्ध थे किन्तु जहाँगीर के राजत्व में यह सम्बन्ध न रह सका। बागुलान पर मुगलों के आक्रमण को रोकने हेतु प्रतापशाह ने अन्य कई युक्तियों मध्य दक्षिण-नीति-नियन्ता मुगल-सम्राटों में सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व रहीम के संस्कृत-प्रेम को भी अपना शस्त्र बनाया ओर उनके जीवन को संस्कृत में प्रस्तुत कर इस आक्रमण से सुरक्षा सुनिश्चित की।

बागुलान एवं मुगल-साम्राज्य के बीच इन सम्बन्धों व आक्रमण सम्बन्धी ऐतिहासिक साक्ष्य समकालीन फारसी तवारीखों व अन्यान्य सन्दर्भों में आंशिक रूप से पढ़े जा सकते हैं किन्तु इन पर विशेष सामग्री इनमें उपलब्ध नहीं। आधुनिक इतिहास-ग्रन्थों में इनकी कोई चर्चा तक नहीं है। इस रूप में प्रस्तुत चम्पूकाव्य अपनी जिस ऐतिहासिक महत्ता को प्रस्तुत करता है उसकी चर्चा यहाँ व्यर्थ है।

इस चम्पूकाव्य की एक अन्य विशेषता जो हिन्दी, संस्कृत एवं फारसी साहित्य के अध्येताओं व प्रेमियों को अपनी ओर बलात् आकृष्ट करती है वह है इस ग्रन्थ में अभिव्यक्त रहीम का संस्कृत-प्रेम, उदार संस्कृत-संरक्षण एवं अन्यद्भाषीय रचना-धर्मियों को उनके द्वारा प्रदत्त विपुल मान-सम्मान। रहीम का संस्कृत-प्रेम जगद्विख्यात है और उनकी संस्कृत-कृतियाँ ३८० से भी अधिक वर्षों से विद्वानों द्वारा सम्मान पाती रही हैं।


(प्रकाशित पुस्तक का फ्लैप-मैटर)

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