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संस्कृत-साहित्य को मुस्लिमों का योगदान, खण्ड-1


  • खानखाना अब्दुर्रहीम और संस्कृत
  • लेखक: प्रताप कुमार मिश्र
  • प्रथम संस्करण - 2007 ई.
  • भूमिका 6,+342 पृष्ठ
  • सूची, अनुक्रमणिका, ग्रन्थसूची
  • ISBN: 978-81-906145-0-4 (H.B.)
मूल्य: १२२/- (सर्वकारीय आर्थिक सहायता से प्रकाशित)

गुप्त-साम्राज्य एवं अन्तिम मौखरी-सम्राट् के बाद किसी भी प्रकार के भारतीय साहित्य; खासकर संस्कृत साहित्य का स्वर्णयुग एक हजार वर्षों के बाद अकबर के राजत्व में ही परिलक्षित होता है। मध्यकालीन अखण्ड भारत की महान् विभूति ‘रहीम’ संयोग से इसी काल में हो आए हैं। विविध भाषा एवं विषय-विशेषज्ञों के बीच लगभग ३७५ वर्षों से सम्मानित रहीम का विराट् व्यक्तित्व कभी-कभी अविश्वास की स्थिति उत्पन्न कर देता है। मध्यकालीन इतिहास-विश्लेषक उन्हें पिता की तरह ही ‘सल्तनत-ए-तैमूरिया’ की नींव का ईंट मानते रहे हैं। अबुल फज़ल उन्हें मुगलों की ओर से ‘दक्षिण का नीति-नियन्ता’ मानता है तो बदायूँनी उन्हें गुजरात का अप्रतिम व दुर्धर्ष योद्धा।

१८ वीं सदी का प्रखर इतिहासकार उन्हें ‘संसार का विलक्षण दानी’ बताता है तो भाषावैज्ञानिकों का एक समुदाय उन्हें मध्ययुग का ‘मैसीनेस’। समकालीन एक इतिहासविद् उन्हें हिन्दी-शायरी (कविता) का ‘यजेबैदा’ के गौरव से नवाजता है जिसे विगत शताब्दियों ने झुककर सिज़दा किया। फारसी-अदब में वे शेख़सादी, उर्फी तथा नजीरी की कोटि में रखे जाते हैं। समकालीन एक संस्कृत-महाकवि उन्हें विलक्षण संस्कृतज्ञ बताता है तो १८ वीं सदी का ही एक बेबाक इतिहास-लेखक उन्हें ‘भोजराज’ कहकर संबोधित करता है।

रहीम के संस्कृत-अध्ययन, कृतित्व व योगदान पर लगभग ३७५ वर्षों के प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। इन्हें आज तक व्यवस्थित रूप नहीं दिया जा सका। इस पुस्तक में विवेचित उनके संस्कृत-अध्ययन का स्रोत, संस्कृत के युग-प्रधान शेमुषी-धनियों के साथ उनका संपर्क, उनकी संस्कृत-कविता समीक्षा, रहीम की उपलब्ध समग्र संस्कृत-कृतियाँ, इनकी प्रमाणिकता, प्रकाशन व लोकप्रचार का इतिहास, रहीम पर लिखित संस्कृत-रचनाएं और इनमें निबद्ध रहीम-संस्कृत-पाण्डित्य आदि विवरण इस पुस्तक से पूर्व अज्ञात ही नहीं दुर्लभ भी थे। इन सबकी प्रस्तुति में साक्ष्यों का एकत्रीकरण, इनका ग्रहण व निस्तारण; चकित किये बिना नहीं रहेगा। ‘बरवै की मीमांसा व इतिहास’ हिन्दी-साहित्य को तो ‘त्रिशूली के रूप में पण्डितराज जगन्नाथ की पहचान और उन्हें संस्कृत-कविता शैली का उपदेश’ संस्कृत-साहित्य के लिए दुर्लभ भेंट सी होगी। ३० से अधिक भागों में समाप्त होने वाली इस परियोजना का एक लक्ष्य - ‘संबद्ध संस्कृत-सेवी मुस्लिम विद्वानों की संस्कृत-कृतियों का परिशिष्ट में प्रकाशन’ पाठकों को विषय-वस्तु व इनके मूल्यों की विवेचना का सुअवसर प्रदान करेगा।


(प्रकाशित पुस्तक का फ्लैप-मैटर)

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