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संस्कृत-साहित्य को मुस्लिमों का योगदान (मुग़ल), खण्ड-2


  • मुगल सम्राट् अकबर और संस्कृत-3
  • लेखक: प्रताप कुमार मिश्र
  • प्रथम संस्करण - 2019 ई.
  • भूमिका-04,+74 पृष्ठ
  • ISBN: 978-81-906145-7-3 (P.B.)
मूल्य: 200/- भाग-3 मात्र के लिए (संस्थान द्वारा प्रकाशित)

इतिहास; सतत अन्वेषण और प्रतिपद अनुशीलन का विषय है। इसके पन्नों पर उट्टंकित पंक्तियाँ अपने पढने वालों से जिन दो चीज़ों की मौन याचना करती हैं, वह हैं - जड चट्टान सा धैर्य और घटनाओं के सहज विश्लेषण की असहज क्षमता। किन्तु सामयिक देश, काल और परिस्थितियाँ ऐसे किसी धैर्य और क्षमता को या तो क्षीण कर देती हैं या फिर दिग्भ्रान्त।

यद्यपि कि मुग़ल-कालीन भारतीय इतिहास पिछली दो सदियों से सतत अनुसन्धान और प्रतिपद अनुशीलन का मुख्य विषय रहा है किन्तु इस इतिहास में अन्तर्विलीन ऐसे अनेक पक्ष अभी हैं जो पढने वालों के दिलो-दिमाग़ में बिजली की तरह कौंध उठते हैं।

अकबरसहस्रनाममाला’ मुल्ला बदायूँनी (अब्दुल क़ादिर बदायूँनी) के फ़ारसी इतिहास-ग्रन्थ के पन्नों में अन्तर्विलीन इसी तरह का एक दुर्लभ, अज्ञात और अचर्चित ग्रन्थ है जो हिन्दू धर्म, दर्शन एवं अध्यात्म-साहित्य के साथ ही संस्कृत-वाङ्मय को महान् मुग़ल-सम्राट् अकबर के अविस्मरणीय योगदान के पुनरनुशीलन पर पाठकों को सजग करता है, प्रेरित करता है। हिन्दू अध्यात्म-साहित्य के इतिहास में सहस्रनामावलियों का इतिहास बड़ा प्राचीन ठहरता है। इतिहास की इस सुदीर्घ परम्परा में देवी-देवताओं के बाद कुछ ही गिने-चुने महापुरुष हैं जिनकी प्रशंसा में ‘सहस्रनामावलि’ उपलब्ध होती है। किसी राजा या महाराजा की प्रशंसा में; उसमें भी एक विधर्मी बादशाह की स्तुति में किसी सहस्रनाममाला की रचना हुई हो, -ऐसा न तो संस्कृत-साहित्य के इतिहास में ही देखा-सुना था और न ही हिन्दू अध्यात्म-साहित्य के इतिहास में।

विलम्ब से उपलब्ध होने के कारण इस ग्रन्थ को हम ‘अकबर और संस्कृत’ में समाहित न कर सके थे। इसी परियोजना के अन्य भागों पर अनवरत अनुसन्धान के कारण वर्षों तक इसके प्रकाशन की ओर ध्यान न गया। इस बीच अनुसन्धान-प्रेमियों के बीच इस ग्रन्थ की चर्चा बड़े ज़ोर-शोर से हो रही है और किन्तु दुर्लभ होने कारण यह चर्चा अपने उस परिणाम पर नहीं पहुँचती जो इतिहास की इन घटनाओं के सापेक्ष हममें राष्ट्रीय गौरव का संचार कर सकता है।


(प्रकाशित पुस्तक का फ्लैप-मैटर)

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