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अज्ञात एवं दुर्लभ कृति-प्रकाशन माला, संख्या-३


  • अद्वैतामृतमंजरी
  • रचनाकार: अच्युतराव मोडक (1778-1839 ई.)
  • सम्पादक:
  • विमलेन्दु कुमार त्रिपाठी,
  • राइचरन कामल.
  • हिन्दी अनुवाद: प्रताप कुमार मिश्र.
  • प्रथम संस्करण - 2020 ई.
  • भूमिका 42,+152 पृष्ठ.
  • चित्र : 08 रंगीन, सजिल्द.
  • ISBN: 978-81-906145-8-0
मूल्य: 300/- (संस्थान द्वारा प्रकाशित)

कला हो या भाव; काव्य के दोनों ही पक्षों से सराबोर शतकों और मुक्तकों की संस्कृत में भरमार है और इनकी संख्या गिनना आकाश में तारे गिनने से कम नहीं। हाँ यह ज़ुरूर है कि इन तारों की छटा और चमक-दमक एक-दूसरे से बिलकुल अलग और निराली है। जिस पर भी आँख डालो, हटने का नाम नहीं। संस्कृत की इसी भव्य काव्याकाश-गंगा में टिमटिमाता एक सितारा प्रकाश्य मुक्तक भी है।

अद्वैतामृतमञ्जरी तीन शतकों में संग्रहीत एक मुक्तक काव्य है। शतकों को यहाँ ‘मुकुल’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है - रतिमुकुल, नीतिमुकुल और रतिनीतिमुकुल। साहित्यसार नामा अपने काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ में अच्युतराव मोडक इस मुक्तक से दर्जनों उदाहरण काव्यशास्त्रीय घटकों को समझाने-बुझाने हेतु प्रस्तुत करते हैं। काव्य की सरसता और संस्थान में इसकी हस्तलिखित प्रति सुरक्षित होने के कारण; हम इसके प्रकाशन की ओर उन्मुख हुए। बाद में बड़ौदा से भी इसकी प्रतियाँ प्राप्त हो गईं जिससे इसका सम्पादन और सहज हो गया।

रति, नीति एवं रतिनीति के रूप में शतकों के नामकरण से ग्रन्थ के प्रतिपाद्य का अनुमान कुछ-कुछ हो जाता है किन्तु इनके आन्तरिक अध्ययन से प्रकट है कि समूचे काव्य का प्रतिपाद्य केवल एक है। इसे हम मोटे तौर पर नीति के रूप में ले सकते हैं। सूक्ष्म रूप में यह नीति भारतीय दर्शन; विशेषकर वेदान्त के गूढ सिद्धान्तों में अभिव्यक्त वह उपदेश या सम्प्रत्यय है जो व्यक्ति को द्वैत की परिधि से बाहर ले आने के प्राथमिक सोपान रचते हैं।

नीति के इन सरल सम्प्रत्ययों को प्रस्तुत करने का ढँग यहाँ; इस मुक्तक में बड़ा निराला है। वेदान्तसम्मत नीति-वधूटी को मोडक ने शृङ्गार के उस सतरंगी परिधान में प्रस्तुत किया है जिसके झीने रेशमी वस्त्रों से झलकता, झिलमिलाता नीति-नववधू का अङ्ग-प्रत्यङ्ग किसी भी सहृदय को आपे से बाहर कर सकता है।

अच्युतराव मोडक १८वीं शती के उत्तरार्द्ध और १९वीं शती के पूर्वार्द्ध में वर्तमान संस्कृत-विद्या के अपूर्व आचार्य थे। वेदान्त दर्शन के अध्येता व ग्रन्थकार। आगम, तन्त्र और योग-विद्याओं के जानकार, लेखक। स्थापित साहित्यशास्त्री। रससिद्ध कवि। खण्ड, मुक्तक, गीति, शतक, स्तोत्र, लहरी आदि विधाओं में कई रसपूर्ण काव्यों के रचयिता। दो चम्पू-प्रबन्धों के निर्माता। दो दृश्यकाव्य; एक नाटक और एक भाण के प्रणेता। इन सबसे इतर वह अद्भुत टीकाकार की हैसियत से हमेशा याद किए जाएँगे। पञ्चदशी जैसे दुरूह शास्त्रीय ग्रन्थों से लेकर अमरुशतक और गोवर्धनसप्तशती जैसे सरस काव्य तक की टीका की।

आचार्य मोडक १८३९ ई. में दिवंगत हुए और १८६९ ई. में पहली बार इनकी रचनाएँ प्रकाशित होना शुरू हुईं। १८६९ में नीतिशतपत्र, १८७३ में कृष्णलीलामृत और इसी के आस-पास भागीरथीचम्पू भी प्रकाशित हुआ किन्तु संस्कृत-साहित्येतिहास और सन्दर्भ-ग्रन्थों में इन काव्यों और कवि की चर्चा ढूँढने से भी नहीं मिलने की। १९०६ में साहित्यसार के प्रकाशन के बाद मोडक काव्यशास्त्र के इतिहास में स्थापित हुए और यहाँ से इस इतिहास में इनकी चर्चा चल निकली। किन्तु साहित्य के इतिहास में मोडक का कवित्व और उनकी कविता आज भी सामयिक समीक्षा की ओर मुँह किए बैठे हैं। आशा है ‘दुर्लभ कृति-प्रकाशन माला’ का यह तृतीय पुष्प इस ओर कुछ सहायता कर सकेगा।


(प्रकाशित पुस्तक का फ्लैप-मैटर)

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