प्रत्नकीर्तिमपावृणु = कर प्रयत्न; कि पुरखों की थाती, पहुंचे उनकी सन्ततियों तक.

संस्थान के सम्बन्ध में विद्वानों की सम्मतियाँ

  1. All of your books are really very interesting on the comparative historical ground. Muslim Contribution to Sanskrit Learning; the topic chosen by you is no doubt a most important subject in the history of India and sub-continent and should be taken seriously by modern historians. It is wonder to see some Sanskrit texts of Muslim writers. As you have presented the Sanskrit works of Khan-i-khanan Abdur Rahim in your book, I really had fallen to unbelief in the Khan-i-khanan’s nobility, his learning, his capacity over languages. I think the publication of the Sanskrit translation of Persian Akbar-nama of Abul Fazla, as well as the ‘Nawabkhan-khankhana-charitam’ is great contribution of your Institute. Continue this series and bring them in the world of historians.
    • Prof. Irfan Habib
    • Private Meeting
    • I.H.C.-2015, Gaurbanga University, Malada, W.B.
  2. आज का दिन काशी ही नहीं समूचे देश के लिये बड़ा ही महत्त्वपूर्ण दिन है जब संस्कृत वाले ‘रहीम’ जैसे मुस्लिम संस्कृत‑सेवियों का जन्म‑दिन समारोह के रूप में मना रहे हैं। इसलिये भी कि यह अनुभव किया जा रहा है कि जाति के आधार पर संस्कृत को बाँटा नहीं जा सकता।... ईसा से दो सौ वर्ष पहले संस्कृत का विकास मुख्य रूप से उनके द्वारा हुआ जिन्हें हम बाहरी मानते थे।... इस तरह के किसी संस्थान को तो १०० वर्ष पूर्व ही स्थापित हो प्रचारित हो जान चाहिए लेकिन जाने क्यों ऐसा नहीं हो सका। मुस्लिमों के संस्कृत‑अवदान को प्रकाश में लाकर आप देश की एक बहुत बड़ी समस्या का समाधान कर सकते हैं अतः बनारस ही नहीं समूचे देश के संस्कृत सेवियों को इस संस्थान की सहायता और सहयोग करना चाहिए।
    • प्रो. शुकदेव सिंह
    • अध्यक्षीय उद्बोधन
    • रहीम‑जयन्ती‑समारोह २००४
  3. जिस कार्यक्रम में मैं आमन्त्रित था अर्थात् ‘रहीमजयन्ती‑समारोह’ और इसमें जिन पुस्तकों का लोकार्पण यहाँ प्रस्तावित था; यह दोनों मेरे लिए आश्चर्य की बात थी । आज भी ऐसे कार्य हो रहे हैं और युवक कर रहे हैं आश्चर्य तो होगा ही । अब तो रहीम की सत्ता ही संदिग्ध हो रही है । रहीम थे भी कि नहीं’ के रूप में प्रश्न संभावित हैं । अस्तु, आपलोगों का उत्साह और इस उत्साह की दिशा ने मन को बहुत ही संतोष दिया है ।
    • भानुशंकर मेहता
    • अध्यक्षीय उद्बोधन
    • रहीम‑जयन्ती‑समारोह २००७
  4. मुस्लिम‑संस्कृत संरक्षण’ जैसे शब्दों ने मेरे दिमाग में कई तरह के सवाल पैदा कर दिए थे किन्तु यहाँ आकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई, बल्कि कहिये आश्चर्य और अपने अज्ञान का भान भी । ऐसे किसी संस्थान को तो ५० वर्ष पूर्व ही भारत में सक्रिय भूमिका में आना चाहिए था । आप युवकों ने इसे खड़ा किया है आप धन्यवाद के पात्र हैं । वस्तुतः ज्ञान‑विज्ञान की लिप्सा मनुष्य मात्र को होती है, ज्ञान को धर्म‑सम्प्रदाय‑जाति‑भाषा‑क्षेत्र आदि से कोई सरोकार नहीं । भाषा, साहित्य और इनमें निबद्ध ज्ञान‑विज्ञान पर मानव‑मात्र का अधिकार है और इस अधिकार को कोई भी किसी से छीन नहीं सकता । मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह आपको इस कार्य और प्रयोजन में सफलता दे ।
    • मनु शर्मा
    • मुख्य‑अतिथि उद्बोधन
    • रहीम‑जयन्ती‑समारोह २००७
  5. सबसे पहले तो मैं ‘अखिल भारतीय मुस्लिम‑संस्कृत संरक्षण एवं प्राच्य शोध संस्थान, वाराणसी’ के प्राधिकारियों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने ज्ञान‑विज्ञान की भावभूमि पर इस तरह के एक अलौकिक और सर्वथा प्रशंसनीय मञ्च की व्यवस्था की । इससे पूर्व इस तरह के किसी अन्य संस्थान से मेरा कोई परिचय नहीं जिसमें ज्ञान‑विज्ञान की पवित्र भावभूमि पर विश्व‑कुटुम्ब की स्थापना का प्रयास हो । निश्चय ही इस संस्थान के संस्थापक मण्डल की प्रशंसा होनी चाहिए ।
    • देव प्रकाश शर्मा,
    • विशिष्ट‑अतिथि उद्बोधन
    • रहीम‑जयन्ती‑समारोह २००७
  6. प्रताप जी ने इस संस्थान की स्थापना कर एक बहुत बड़ी कमी पूरी कर दी और वह है ज्ञान‑विज्ञान के धरातल पर दो संस्कृति‑सभ्यता‑साहित्य और समाज को नजदीक लाना । पूरे एक हजार साल तक जिस कौम ने हिन्दुस्तान पर राज किया है उसे हम भारतीय इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, समाज, राजनीति, ज्ञान‑विज्ञान, साहित्य‑सङ्गीत‑कला आदि की तरक्की की बाबत दरकिनार नहीं कर सकते । इन क्षेत्रों में मुगलों के योगदान को सदा ही स्मरण किया जाएगा । प्रताप जी ने अभी बताया है कि संस्कृत‑ज़बान के साथ हमारे बुजुर्गों का रिश्ता तकरीबन १४०० साल से रहा है । जैसा कि मैं स्वयं फारसी‑साहित्य की स्टूडेण्ट हूँ फारसी और संस्कृत के आपसी रिश्तों से मैं वाकिफ़ हूँ । इन हजार सालों में कई एक मुसलमानों ने संस्कृत‑ज़बान पढ़ी है, उसमें इल्म के नायाब किताबें लिखीं हैं, संस्कृत के मैथमैटिक्स‑तिब और नजूमी किताबों के फारसी ज़बान में कई उल्थे मिलते हैं और इसी तरह फारसी से संस्कृत में जो उल्थे किये गए उनकी भी एक लम्बी फेहरिश्त है । लेकिन इस तरह के उल्थे जो कि संस्कृत से फारसी में हुए मुगलों के बाद शुरू हुए और १८ वीं सदी में इनकी फेहरिश्त और बढ़ी ।
    • प्रो. शमीम अख्तर
    • सारस्वत‑अतिथि उद्बोधन
    • रहीम‑जयन्ती‑समारोह २००७
  7. मैं इस संस्थान के संस्थापकों, सदस्यों तथा इसकी निदेशिका को साधुवाद देना चाहता हूँ कि इस प्रकार के संस्थान की स्थापना और इसके माध्यम से ऐसे शोधपूर्ण कार्यों को मूर्त रूप में प्रस्तुत कर आप लोगों ने अद्भुत मिसाल पेश की है । बदलती दुनियाँ के परिदृश्य और वर्तमान विध्वंसक प्रवृत्तियों के मध्य आप लोगों का यह सारस्वत‑प्रयास निश्चय ही भारत को एक सशक्त भावभूमि प्रस्तुत करेगा जिस पर आश्रित हो विविध जातीय चेतना का सम्मिलित प्रयास भारत को ज्ञान‑विज्ञान की भावभूमि पर पुनः एक बार विश्वगुरु‑पद पर आसीन करेगा ।
    • अवधेश प्रधान
    • हिन्दी‑विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय