‘अखिल भारतीय मुस्लिम‑संस्कृत संरक्षण एवं प्राच्य शोध संस्थान’

संस्थान द्वारा प्रकाशित पुस्तकों पर विद्वानों की सम्मतियाँ / समीक्षाएँ

  1. तुर्की उनकी मातृभाषा थी, अरबी धर्मभाषा और फारसी कार्य-भाषा लेकिन हिन्दी (ब्रज एवं अवधी) उनकी साधना-भाषा थी। इन सभी भाषाओं के वे अध्येता, ग्रन्थकर्ता और संरक्षक थे लेकिन जब साहित्य-सर्जन करने बैटते तो सुरसरि गंगा में अपनी लेखनी डुबोकर हाथ भाँजते थे, जो संस्कृत की संवाहिका थी। हिन्दी और फारसी में उन पर कई उल्लेखनीय कार्य हो चुके हैं। इस बीच आपकी शीघ्रप्रकाश्य पुस्तक ‘खानखाना अब्दुर्रहीम और संस्कृत’ की प्रेस-कॉपी देखी जो आश्चर्यजनक रूप में रहीम के संस्कृत-ज्ञान और उनके संस्कृत-परक अवदान को निरूपित करती है। निश्चित ही प्रकाशित होने पर यह संस्कृत ही नहीं हिन्दी साहित्य के इतिहास के लिये भी नई चुनौतियाँ लाएगा और रहीम पर अध्ययन तथा शोध की एक नई दिशा तय करेगा।
    • स्व० किशोरीलाल गुप्त
    • प्रख्यात हिन्दी-इतिहासकार, आलोचक
  2. आपकी किताबों ने अब रहीम के व्यक्तित्व और कृतित्व के मूल्याङ्कन को और भी संवेदनशील बना दिया है । हिन्दी वालों को अब और भी सावधानी से रहीम का मूल्याङ्कन करना होगा । फारसी वालों को भी । अब तक वे हिन्दी-फारसी के ही साधक माने जाते रहे । प्रताप जी ने इन पुस्तकों के प्रकाशन से रहीम-अध्ययन को नई दिशा और दशा दी है, नए आयाम दिए हैं । संस्कृत वालों को तो विशेष सावधान होकर इसे इतिहास में सम्मिलित करना होगा । संस्कृत-साहित्य के इतिहास में रहीम का यूँ समावेश बहुत सुखकर होगा, गौरव की बात होगी, होना भी चाहिए ।
    • भानुशंकर मेहता
    • प्रख्यात संस्कृति-कर्मी, लेखक, आलोचक
  3. संस्कृत में उनका लिखा ‘खेटकौतुकम्’ चर्चा का विषय है । यहाँ उनकी भाषा पर मैं विस्तार दूँगा । हिन्दी में तो उनकी भाषा ‘सधुक्कड़ी’ है; जो कि पाली-प्राकृत-अपभ्रंश-संस्कृत-अवधी-व्रज-फारसी आदि का मिश्रण है किन्तु उनकी संस्कृत-भाषा, संकर-संस्कृत का श्रेष्ठ उदाहरण है । संकर-संस्कृत का प्रयोग बहुत प्राचीन है... । इतिहास बताता है कि रहीम के पूर्वज ईरान के इसी क्षेत्र तुर्की के निवासी थे । इसका आशय यह हुआ कि हजारों वर्ष बाद रहीम को संकर-संस्कृत का यह धरोहर, विरासत के रूप में प्राप्त हुआ और इस भाषा में ही उन्होंने संस्कृत-ग्रन्थों का प्रणयन किया । खेटकौतुकं की चर्चा मैं कर चुका हूँ और प्रताप जी की इस पुस्तक में मैंने उनकी ‘द्वात्रिंशद्योगावली’ को भी देखा है, इसकी भाषा वही संकर-संस्कृत है । वैसे रहीम के दो पद्य - एकस्मिन् दिवसावसानसमये मैं था गया बाग में.. इत्यादि भी इसी भाषा के उदाहरण हैं । इसे हम रहीम का भाषा-कौतुक भी कह सकते हैं । कई भाषाओं का पारंगत कवि, कविकर्म के समय भाषाओं के साथ खिलवाड़ किया करता है । ‘खानखाना अब्दुर्रहीम और संस्कृत’ रहीम की संस्कृत-साधना के अनेक अज्ञात पहलुओं के रहस्य खोलता है, उनकी संस्कृत-कृतियों का प्रकाशन एक बड़ी आवश्यकता की पूर्ति है। संस्कृत-शोध अनुसंधान की धारा में इन पुस्तकों का स्वागत तो होना ही चाहिए गम्भीर विचार और विश्लेषण भी।
    • प्रो. वागीश शास्त्री
    • सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय
  4. मैंने तो हिन्दी-साहित्य की धारा से रहीम को जाना है और जानता था आज आपलोगों के बीच और भी आश्चर्यचकित हूँ । आप यहाँ उनके संस्कृत-प्रेम और योगदान ही नहीं उनकी संस्कृत-कृतियों की चर्चा कर रहे हो, वह भी एक नहीं कई कृतियों की, विलक्षण और आदर्श संस्कृत-कृतियों की । प्रतापकुमार मिश्र ने अभी अभी यह बताया है कि संस्कृत-साहित्यशास्त्र के मानदण्ड और युगपुरुष पण्डितराज जगन्नाथ तक को रहीम ने संस्कृत-कविता के हुनर सिखाए, उनके साथ संस्कृत-छन्दों में रहीम का पत्राचार था । तो यह सब क्या है, क्या थे रहीम ।
    • मनु शर्मा
    • प्रख्यात हिन्दी उपन्यासकार
  5. ज्ञान-विज्ञान की भावभूमि पर जिस भाईचारे की नींव हजारों वर्ष पूर्व रखी गई उसकी व्याख्या का समय आ गया है और रहीम इस कार्य के प्रतीक हो सकते हैं । हिन्दी-रचनाओं की बात मैं नहीं करूंगा । उनकी संस्कृत-कृतियों से समाज अपरिचित है और संस्थान ने इन पुस्तकों के प्रकाशन द्वारा एक प्रशंसनीय कार्य कर इस कमी को पूरा कर दिया । ‘नवाबखानखानाचरितम्’ की प्रति को मैंने अभी देखा है, दो-चार पृष्ठ ही पलटे होंगे । रहीम के संस्कृत-ज्ञान पर उपलब्ध यह साक्ष्य इतिहास ही नहीं, हिन्दी-संस्कृत साहित्य के इतिहास को भी एक गति देगा । इसका प्रकाशन प्रशंसा का पात्र है । इस प्रकार के अन्य प्रकाशन पर संस्थान दत्तचित्त रहे ।.....
    • डा. शितिकण्ठ मिश्र
    • पूर्व-प्राचार्य, डी.ए.वी. कालेज, वाराणसी
  6. डॉ. प्रताप कुमार मिश्र द्वारा प्रस्तुत ग्रन्थ ‘खानखाना अब्दुर्रहीम और संस्कृत’ शोध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण, मौलिक और गंभीर शोध ग्रन्थ है। आज का हिन्दी अकादमिक साहित्य जगत दो व्याधियों से ग्रस्त है। एक तो शोध के नाम पर प्रायः खिलवाड़ हो रहा है। चोरी और संग्रहीवृत्ति का शिकार अधिकांश शोधकार्य सतही और नकली होता है। उसमें ठोस सामग्री नगण्य, निरर्थक और पिष्टपेषण मात्र ही अधिक होती है। दूसरी व्याधि है ग्रन्थों की अनाप-शनाप कीमत रखने की होड़। एक भ्रान्ति यह भी है कि जिस ग्रन्थ की कीमत अधिक होगी वह अपेक्षा-कृत अधिक श्रेष्ठ होगा।.....
    • सौभाग्य से यह ग्रन्थ उन दोनों व्याधियों से पूर्णतः मुक्त है। इसे बेहिचक श्रेष्ठ शोधकार्य का नमूना माना जा सकता है। इससे यह आश्वस्ति होती है कि भारत का हिन्दी जगत श्रेष्ठ शोधकर्त्ताओं से खाली नहीं है। अभी भी उसमें ज्योति और उर्जा विद्यमान है।
    • अपनी स्थापनाओं के लिये लेखक ने संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, अरबी, फारसी आदि भाषाओं के सैकड़ों ग्रन्थों को बड़ी सूक्ष्मता और तार्किकता से खंगाला है। उन्होंने हर अनुमान को नकारते हुए तथ्यों की कसौटी पर कसके ही निस्कर्ष प्रस्तुत किये हैं। तमाम विद्वानों द्बारा दिये गए तथ्यों को आँख मूंदकर या आदर-भाव से स्वीकार नहीं किया। अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों की स्थापनाओं को अपने अनुसंधान के बल पर खण्डित या पुष्ट किया है। यह ग्रन्थ रहीम के व्यक्तित्व कृतित्व का विवरण और प्रामाणिक विश्लेषण ही नहीं अपितु इतिहास का आकलन भी है। इसमें कई ऐसी बातें हैं जिनकी ओर अभी तक विद्वानों का ध्यान ही नहीं गया, वे पहली बार उजागर हुई हैं।....
    • ग्रन्थ के अंत में दी गई ऐतिहासिक व्यक्तियों, ग्रन्थों, पत्र-पत्रिकाओं की अनुक्रमणिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसे तैयार करने में लेखक ने पर्याप्त श्रम किया है। इस अनुक्रमणिका को देखकर लेखक द्वारा किये श्रम और शोध का अनुमान लग जाता है।.
    • डॉ. गंगाप्रसाद गुप्त ‘बरसैंयां’
    • सम्मेलन, शोध-त्रैमासिक हेतु प्रेषित समीक्षा से साभार
  7. किसी भी प्राचीन कवि का जीवन-परिचय और उसकी कृतियों का प्रामाणिक अध्ययन प्रस्तुत करना परिश्रम साध्य, व्यय साध्य एवं समय साध्य कार्य है। श्री प्रताप कुमार मिश्र ऐसे सुधी साहित्यान्वेषी हैं जिन्होंने लगन और परिश्रम-पूर्वक धैर्य धारण कर ‘खानखाना अब्दुर्रहीम और संस्कृत’ नामक शोध-ग्रन्थ लिखकर शोधाथिर्यों के समक्ष एक उदारहण प्रस्तुत करने का स्तुत्य कार्य किया है।...... यह ग्रन्थ प्रमुख रूप से तीन खण्डों में विभक्त है। प्रत्येक खण्ड विषयानुसार अलग-अलग शीर्षकों और उपशीर्षकों में विभक्त है।.... खण्ड तीन में रहीम के विलक्षण संस्कृत पाण्डित्य एवं उनकी संस्कृत कृतियों का समीक्षात्मक अध्ययन किया गया है। ग्रन्थान्त में ११ परिशिष्ट हैं जिनमें लेखक ने क्रम से समय समय पर ग्रन्थों और पत्रिकाओं में प्रकाशित मदनाष्टक का पाठ ज्यों का त्यों रखा है। पुनः गंगाष्टकम्, द्वात्रिंशद्योगावली, नवाबखानखानाचरितम् और खेटकौतुकम् का मूल पाठ दिया है। लेखक ने रहीम द्वारा संस्कृत में लिखे गये ग्रन्थों पर विचार करते हुये उनकी ज्योतिष विषयक रचना खेटकौतुकम् पर विस्तार-पूर्वक चर्चा की है और उसे रहीम की प्रामाणिक रचना माना है।.... किन्तु यहाँ श्री हरिप्रसाद नायक के मत का उल्लेख कर देना उचित समझता हूँ। श्री नायक जी ने खेटकौतुकम् को रहीम की रचना नहीं माना है।.... यह ग्रन्थ अनुसंधित्सुओं और अध्येताओं को दिशा बोध देने वाला है। मध्यकालीन और अर्वाचीन विद्वानों के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों के उद्धरण को देते हुए लेखक ने अपनी उपस्थापनाओं को पुष्ट किया है। इस हेतु लेखक को कठिन परिश्रम करना पड़ा है। ग्रन्थ की साज-सज्जा श्रेष्ठ कोटि की, कागज अच्छा और छपाई नयनाभिराम है। इस सारस्वत कार्य के लिये लेखक की जितनी सराहना की जाय कम है।
    • उदयशंकर दुबे,
    • ‘खानखाना अब्दुर्रहीम पर लिखा गया एक आदर्श शोध ग्रन्थ’
    • सम्मेलन, शोध-त्रैमासिक, भाग-९६, संख्या-४, २०१२ ई.
  8. यहाँ मैं स्पष्ट रूप से यह कहना चाहती हूँ कि इल्म और ज़बान पर किसी भी आदमजात का एकाधिकार नहीं होता और यह आम आदमी की जायदाद होती है । ज़बान; चाहे वह फारसी हो या संस्कृत सभी आदमी को जिन्दगी का यथार्थ रूप देती है, ज्ञान देती है । इल्म; सभी आदमजात को अन्धकार से प्रकाश की ओर ले आता है और इसलिए इल्म ओ जबान की बाबत हम देखते हैं कि बुजुर्गों ने विश्व की सभी भाषाओं और इल्म के संसाधनों को समेटा और अपनी आगे वाली पीढ़ी को सौंपा । इस क्रम में रहीम सदा ही स्मरण किए जाने वाले विद्वान्, कवि, ग्रन्थकार और लेखक हैं । उनके ज्योतिष-मसनवी को देखकर आश्चर्य होता है । किस खूबसूरती से फारसी ओ संस्कृत का घालमेल किया है । रहीम की फारसी रचनाओं से तो हम वाकिफ थे उनकी संस्कृत रचनाएं जो तकरीबन फारसी-दाँ लोगों को नामालूम हैं, को प्रकाशित कर आपने बहुत बड़ा काम किया है, इसकी जरूरत थी।
    • प्रो. शमीम अख्तर
    • फारसी-विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
  9. मैं प्रताप कुमार मिश्र जी को हार्दिक रूप से बधाई जिन्होंने अनुसन्धान के मानदण्ड पर दो अच्छी पुस्तकों को इस रूप में प्रकाशित किया । दोनों ही पुस्तकों की विषय-वस्तु और संप्रेषणीय भाव-वस्तु निश्चय ही वर्तमान समाज के लिए अमूल्य उपहार हैं । शैक्षणिक जगत के लिए भी और साधारण जनता के लिए भी ।
    • देवप्रकाश शर्मा
    • निदेशक – भारत कला भवन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
  10. महाकवि रहीम का नाम हिन्दी-साहित्य के विद्यार्थी और विद्वानों से अपरिचित नहीं है और इस रूप में हम कहें कि भारत का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने रहीम के दो-चार दोहे न पढ़े हों । रहीम की हिन्दी और फारसी रचनाओं से तो समग्र भारत परिचित है किन्तु उनकी संस्कृत रचनाओं से हम उतने परिचित नहीं । उनकी कतिपय संस्कृत-रचनाएं सुनी अवश्य जाती हैं किन्तु जिस रूप में इस संस्थान ने उनकी संस्कृत-कृतियों और उनके संस्कृत-परक योगदान को इन पुस्तकों के प्रकाशन के माध्यम से समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है । मैं इन पुस्तकों के लेखक प्रताप कुमार मिश्र को भी शुभाशीष देना चाहता हूँ कि वे इसी प्रकार सारस्वत-कर्म में लगे रहें और इस प्रकार के अज्ञात विषयों तथा धरोहर-भूत ग्रन्थों का प्रकाशन करते रहें ।
    • प्रो. अवधेश प्रधान
    • हिन्दी-विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
  11. अनुसंधानात्मक आवेग के साथ लिखी गई पुस्तक ‘खानखाना अब्दुर्रहीम और संस्कृत’ अल्पचर्चित और अनछुए ऐतिहासिक-साहित्यिक तथ्यों को प्रामाणिक तौर पर प्रस्तुत करती है। कुछ स्थलों पर मौजूद अप्रौढ दृष्टि, दुहराव और संरचनात्मक कमजोरी के बावजूद यह पुस्तक साहित्य की इतिहास-दृष्टि के लिये महत्त्वपूर्ण और हिन्दी शोधवेत्ताओं को सीख देने वाली है। इसका महत्त्व इसलिये भी बढ जाता है कि यह ‘संस्कृत साहित्य को मुस्लिमों का योगदान’ नामक दीर्घ परियोजना का एक हिस्सा है। .....लेखक ने पण्डितराज जगन्नाथ और त्रिशूली की अभिन्नता प्रमाणित की है। ‘गंगालहरी’ की कुछ प्राचीन हस्तलिखित प्रतियों में जगन्नाथ के नाम के साथ ही उनके नाम के आगे त्रिशूली पद का प्रयोग किया गया है।
    • मधुप कुमार
    • ‘मध्यकाल और रहीम का संस्कृत प्रेम’
    • साखी (प्रेमचन्द साहित्य संस्थान का त्रैमासिक), अंक-२२, २०११ ई.